Some of the functionalities will not work if javascript off. Please enable Javascript for it.

The Nehru Memorial Museum & Library

News

‘Aupniveshik Bharat mein Pratibandhit aur Vivadit Cinema, 1913-1935’ , 14th October, 2014.

सार:

क्योंकि, विशेषकर प्रारम्भिक सिनेमाई युग की सर्वाधिक फिल्में, ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका व जर्मनी में बन रही थीं, जो उस काल के अग्रणी साम्राज्यवादी देश थे तथा जिनका स्पष्ट उद्देश्य अपने उपनिवेशों में साम्राज्यवादी विचारो के लिये प्रशंसापरक माहौल का निर्माण करना था, इसलिये कहा जा सकता है कि, साम्राज्यवाद के केन्द्र स्थलों पर उत्पन्न होने वाला सिनेमा, अपनी उत्पत्ति के साथ ही, साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक दृष्टिकोण से सम्बद्ध होने के लिए अभिशप्त था। दूसरी तरफ, भारत जैसे देशों में प्रेसों से निकलने वाला साहित्य, जिसमें समाचार पत्रों में देश की समकालीन स्थिति का यथार्थपरक विवरण, देश प्रेम से ओतप्रोत कवितायें, साम्राज्यवाद विरोधी कवितायें, देश के लिए सर्वस्व त्याग और बलिदान का उदाहरण प्रस्तुत करने वाले क्रान्तिकारियों की प्रशंसा परक लेख, देश के भीतर राष्ट्रवाद की एक ऐसी अन्तरतरंग धारा प्रस्तुत कर रहे थे जो साम्राज्यवादी-औपनिवेशिक चेहरे को बेनकाब कर देने की मंशा रखते थे। ऐसे में साम्राज्यवादी देशों के औपनिवेशिक हितों और उपनिवेश विरोधी हितों में टकराव अवश्यम्भावी था। यह वह जमीनी हकीकत थी, जहां दोनों ही वैचारिक ध्रुव सिनेमा को अपने अपने प्रचार का माध्यम बना सकते थे। 1913 से 1935 के मध्य औपनिवेशिक भारत में प्रतिबन्धित एवं विवादित सिनेमा पर यह व्याख्यान भारत में निर्मित सिनेमा के माध्यम से औपनिवेशिक प्रशासन और भारतीय समाज की इच्छाओं और आकांक्षाओं के बीच टकराव को तो दर्शाता ही है साथ ही साथ यह विभिन्न साम्राज्यवादी देशों में बनने और भारत में प्रदर्शित की जाने वाली फिल्मों के माध्यम से उनके आपसी अन्तद्र्वन्द्व पर भी प्रकाश डालता है। यह व्याख्यान औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा सिनेमा तकनीक पर प्रतिबन्ध और अभिवेचन के पीछे उसकी मूल मंशा की पड़ताल करता हुआ यूरोपीय और भारतीय समाज की अनेक मनोग्रंथीयो को उद्घाटित करता है। इस सबके साथ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के साथ इस अवधि में भारतीय सिनेमा द्वारा जनजागरण में उसके योगदान की पहचान इसकी केन्द्रीय विषयवस्तु है।

वक्ता:

नरेन्द्र शुक्ल, जिन्होंने ‘ब्रिटिश उत्तर प्रदेश में प्रतिबन्धित साहित्य‘ पर अपनी पी.एच.डी. थीसिस प्रस्तुत की है। वर्तमान में यह नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय के जूनियर फेलो के तौर ‘औपनिवेशिक उत्तर भारत (पंजाब, दिल्ली, बिहार एवं मध्यप्रान्त) में प्रतिबन्धित साहित्य‘ विषय पर कार्यरत हैं।

Photo Collections
Event Photographs

News

Back to Top