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The Nehru Memorial Museum & Library

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‘Gandhi-Vichar, Janandolan aur Shiksha’, 30th January, 2015.

on

‘Gandhi-Vichar, Janandolan aur Shiksha’

by

Dr. Deepti Priya Mehrotra,
NMML.

सार:

गांधी.विचार के कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर नज़र डालते हुए, प्रस्तुत वक्तव्य समकालीन जनांदोलन व शिक्षा से संबंधित कुछ सवाल उठाता है। गांधी.विचार में ‘अहिंसक समाज’ की कल्पना निहित है। अहिंसक समाज की ओर बढ़ने के लिए, अहिंसक तरीके अपनाने होंगे। प्रत्येक इंसान अहिंसा अपना सकता है - महिला हो या पुरूष, बच्चे या बुजुर्ग, अहिंसा के अनेक रूप हैं - नैतिक, दार्शनिक व व्यवाहारिक। सवाल उठता है - समाज में फैली हिंसा, बेइंसाफी और गैर-बराबरी का सामना करने के लिए क्या अहिंसा कामयाब हो सकती है ? क्या अनेक जन आंदोलनों में अहिंसा अपनाना संभव है ? क्या अहिंसा व सत्याग्रह के सुझाए तरीके सार्थक हैं ? गांधीजी के नज़रिए से देखें तो इन सवालों के जवाब स्पष्ट हैं। इन्हीं सवालों को समकालीन महिला आंदोलन, पर्यावरण व शांति आंदोलन इत्यादि के नज़रिए से देखने व जवाब खोजने की भी आवश्यकता है। गौरतलब है कि अहिंसा केवल राजनीति अथवा रणनीति नहीं, बल्कि व्यक्ति के विकास व मानवीय मूल्यों का आधार व स्रोत भी हो सकता है। अहिंसक समाज व व्यक्तिगत विकास की राह में गांधी ने शिक्षा को खास महत्व दिया था। कुछ समकालीन गांधीवादी प्रयासों पर नज़र डालते हुए, बुनियादी शिक्षा व ‘नई तालीम’ का क्या सार्थक स्वरूप हो सकता है, और अहिंसक समाज की स्थापना में इनका क्या योगदान होगा- इस पर विचार मंथन होगा।

परिचय:

डॉ. दीप्ति प्रिया मेहरोत्रा की लिखी पुस्तकों में शामिल हैं, स्वतंत्रता सेनानी जग्गी देवी की जीवनी, तथा इरोम शर्मिला की संघर्ष-गाथा, जो वर्तमान की एक बेमिसाल सत्याग्रही हैं। डॉ. मेहरोत्रा का पीएचडी शोध भारतीय महिला आंदोलन पर था। लंबे अरसे से वे अनेक जनतांत्रिक प्रयासों के साथ जुड़ी रही हैं। वर्तमान में वे तीन मूर्ति में फेलो हैं। वे 1980 दशक के जन-आंदोलनों पर शोध में रत हैं।

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