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The Nehru Memorial Museum & Library

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‘Machhuaron ke Adhikaron ki Badalti Paridasha aur Nadiyon ka Sanrakshan: Vikramshila Ganga Dolphin abhyaranya ke jharokhe se’, 2nd February, 2015.

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‘Machhuaron ke Adhikaron ki Badalti Paridasha aur Nadiyon ka Sanrakshan: Vikramshila Ganga Dolphin abhyaranya ke jharokhe se’

by
Dr. Sunil Chaudhary,
Bhagalpur University,
Bhagalpur.

सार:

यह चर्चा नदियों के संरक्षण एवं नदी मत्स्यों के अंतर्संबंधों पर केन्द्रित है। हमारे सामने विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या नदियों एवं उनकी जैव-विविधता के लिए नदी मत्स्यकी एवं मछली की शिकारमाही एक बड़ा खतरा है, या ऐसा कुछ भी नहीं है या इससे परे कुछ और भी है ? इस विषय पर नदी संरक्षण से जुडे़ लोगों की दो सोच है - (क). एक वर्ग नदी एवं जैव-विविधता संरक्षण और नदीय मत्स्यकी को परस्पर विरोधाभासी मानता है। अतः जैव-विविधता के संरक्षण के लिए नदियों में मछली की शिकारमाही पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए जाने का हिमायती है। (ख). दूसरा वर्ग नदी मत्स्यकी को नदी की पारिस्थितिकी एवं जल-जीवों के लिए कोई खतरा नहीं मानता। सदियों से नदियों में मछुआरों की उपस्थिति है और वे नदियों को देख-रेख करते आ रहे हैं। अतः नदियों के संरक्षण एवं प्रबंधन की कार्य योजना में यह वर्ग स्थानीय मछुआरों की भागीदारी को आवश्यक मानता है।
ऊपर दिए गए दोनांे तर्क अलंकारिक, आदर्शवादी एवं राजनीति से प्रेरित लगते हैं। 1991 में बिहार सरकार द्वारा उद्घोषित विक्रमशिला गांगेय डाल्फिन अभयारण्य आज भी वस्तुतः कागज पर ही है। अभयारण्य नदी क्षेत्र में मछली की शिकारमाही पूर्णरुपेण प्रतिबंधित होते हुए भी धड़ल्ले से हो रही है। इसके विपरीत बिहार की अन्य नदियों में मछली मारने की खुली छूट है। इससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। मछुआरे और गांगेय डाल्फिन नदी के उसी क्षेत्र को पसंद करते हैं जहां छोटे आकार की मछलियों की उपलब्धता है। मछुआरों द्वारा बिछाए गए जाल में डाल्फिन फंस कर डूब जाते हैं और मर जाते है। इस स्थिति के लिए मछुआरों ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। फलस्वरुप मछुआरों और कानून के रखवालों के बीच का विरोध मुखर होता जा रहा है। गंगा के किनारे रहने वाले मछुआरों (अभयारण्य क्षेत्र में करीब 500 परिवार) के जीवन-यापन का एकमात्र साधन मछली की शिकारमाही ह।ै मछुआरां े का जीवन हमेशा स े कठिन रहा ह।ै नदी प्रदूषण, भूक्षरण, बाढ़, कटाव, जल-जमाव, वर्षा की अनिश्चितता के परिणामस्वरुप नदी के तटवर्ती क्षेत्रों की कृषि भूमि का लगातार कम होते जाना, अनुत्पादक कृषि, भयंकर शोषण एवं भयंकर गरीबी को झेल रहे मछुआरे, गंगा पर अपराधी दलों का वर्चस्व, सरकारी तंत्र की उदासीनता एवं राजनैतिक प्रयासों की शून्यता-निश्चय ही नदी की पर्यावरण, नदी की जैव-विविधता एवं नदी संसाधनों पर गुजर-बसर करने वाले मछुआरों के विनाश के कारण प्रतीत होते है। साथ ही नदी में बांध, बराज (विशेषकर फरक्का बराज) एवं जल-विद्युत इकाईयों का निर्माण, नदी के प्राकृतिक बहाव में कमी, तटबंधांे का निमाणर्् ा एवं तटवर्ती इलाकांे का अतिक्रमण जैसी चीजें भी इस स्थिति के लिए कहीं न कहीं उत्तरदायी है। प्रश्न है कि इस स्थिति में गंगा की सोसं या अन्य जल-जीवो ं एवं वनस्पतियो ं तथा गंगा पर आश्रित मछुआरांे की रक्षा कसै े हो सकेगी ?
विक्रमशिला अभयारण्य में पिछले 15 वर्षों तक काम करने के अनुभव एवं सीख के आधार पर हमने नदी मत्स्यी एवं जैव-विविधता संरक्षण के अंतर्संबंधों एवं इसे प्रभावित करने वाले कारकों का विश्लेषण करने की कोशिश की है। परम्परागत मछुआरे आखिर कौन हैं और उनके परम्परागत अधिकार क्या हैं ? नदियांे के पानी पर किसका अधिकार हैं ? मछली उद्योग कैसे मछुआरों के हाथ से फिसलकर बिचैलियों और उद्योगपति एवं व्यापारी घराना ंे की गिरफ्त मे ं आ गया ? मशीन की इस दाडै ़ में धीरे-धीरे देशी मछुआरे, देशी नावै देशी जाल और ऐसी ही देशी चीजें क्यों पिछड़ती गईं ? क्यों मछली-उत्पादन ज्यादा बढ़ाने की योजना तो बनी लेकिन मछुआरों को साथ लेकर चलने की कोशिश नहीं की गई ? क्यों परम्परागत मछुआरे भी विदेशी तरीकों एवं साधनों को अपनाने को मजबूर हुए ?
हमारा उद्देश्य नदीय मत्स्यकी के जटिल स्वरुप की ओर जैव-विविधता संरक्षण से जुडे़ लोगों का ध्यान आकृष्ट करना है। हमारा अवधारणा है कि राजनैतिक, सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय आयामों को नदी मत्स्यकी प्रबंधन से जोड़े बिना नदी का या नदी की जैव-विविधता का संरक्षण संभव नहीं। आज जरुरत है जैव-विविधता संरक्षण से जुडे़ लोगों एवं नीति निर्धारकों को पहल करने की, ताकि इससे जुडे़ विभिन्न वर्गों के बीच आपसी संवाद एवं विश्वास स्थापित हो सके, तभी वर्तमान स्थिति उलट सकती है और इन्ही प्रयासों से नदी एवं नदी की जैव-विविधता का सरं क्षण सभ्ं ाव है आरै साथ ही मछुआरों के हितों की रक्षा हो सकती है।

परिचय:

प्रो. सुनील कुमार चौधरी, प्रख्यात पयार्वरणविद् है और पिछले पंद्रह वर्ष से बिहार में अव्यस्थित ‘विक्रमशिला गांगेय डॉलफिन अभयारण्य’ में गंगा नदी की पारिस्थितिकी एवं नदी की जैव-विविधता के संरक्षण के लिए अनवरत कार्यरत्त है। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उनकी पहचान नदी एवं नदीय डॉलफिन विशेषज्ञ के रुप में है। नदीय डॉलफिन पर कार्यो के लिए प्रो. चैधरी को प्रतिष्ठित फुलब्राइट फेलोशिप सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। फुलब्राइट फेलोशिप के अंतर्गत उन्हें अमेरिका के प्रतिष्ठित संस्थानों, यथा - शिकागो जूलॉजिकल सोसाइटी, मोट मरीन लैब, सारासोटा, फ्लोरिडा, टेक्सास ए. ऐण्ड एम. यूनिवर्सिटी एवं अमेरिकन सिटेसियन सोसाइटी, सिएटल से जुड़ने का अवसर मिला जहां उन्होंने डॉलफिन अध्ययन के लिए विशेष तकनीक का प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने नदी एवं नदीय डॉलफिन पर कार्य कर रहे युवा शोध-कर्ताओं को बढ़ावा देने के लिए ‘विक्रमशिला जैव-विविधता शोध एवं शिक्षा केन्द्र’ की स्थापना की है। 1978 में उन्होंने भागलपुर विश्वविद्यालय में योगदान किया और वर्तमान मंे विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर वनस्पति विज्ञान विभाग में आचार्य के पद पर कार्यरत हैं।

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