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The Nehru Memorial Museum & Library

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‘Monsoon: Ek itihaskaar ki nazar se’ ,16th March, 2015.

‘Monsoon: Ek itihaskaar ki nazar se’

by

Dr. Mayank Kumar,
University Grants Commission Fellow,
New Delhi.

सार:

एक इतिहासकार की दृष्टि से जब हम भारतीय महाद्वीप के इतिहास को देखने और समझने की कोशिश करते है तो मानसून ही वह तत्त्व नजर आता है जो कि पूरे के पूरे क्षेत्र को किसी न किसी रुप में प्रभावित करता है। मानसून की यह केंद्रियता हमें समझाती है कि भारतीय इतिहास में मानसून की भूमिका की अवहेलना नहीं की जा सकती है। मानसून एक तरफ तो इतिहास के काल खण्डों की बनावटी सीमाओं से निर्धारित नहीं होता है तो वहीं दूसरी और क्षेत्रीय राजनैतिक परिसीमन को भी नकारता हुआ नजर आता है। मानसून की इस विशेषता का ऐतिहासिक अध्ययन न के बराबर हुआ है, और न ही मानसून की स्वरुप में निरंतर आते बदलावों पर ही सामाजिक वैज्ञानिकों ने टिप्पणी करने की जरुरत महसूस की है। समसामयिक चिंताओं में वैश्विक तापमान वृद्धि के मद्देनजर आई.पी.सी.सी. द्वारा वातावरणीय कारकों के इतिहास को आधार बनाकर भविष्य में हो सकने वाले आकलनो ने मानसून के इतिहास को एक ज्वलंत मुद्दा बना दिया है।
यह व्याख्यान मानव समाज द्वारा मानसून के स्वरुप में आते रहे बदलावों से तारतम्य बनाने के क्रम में इतिहास को पढ़ने की कोशिश करेगा। प्राचीन काल से मानव समाज ने वर्षा आधारित कृषि को मानसूनी वर्षा के अनुसार ढ़ालते रहने का सतत् प्रयास किया है। यह व्याख्यान, उन परंपराओं पर भी एक टिप्पणी करेगा।

परिचय:

डाॅ. मयंक कुमार, सत्यवती काॅलेज (सांध्य) में इतिहास पढ़ाते है। वर्तमान में आप नेहरु स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय में संबद्ध यू. जी. सी. फेलो है। आपने मानसून इकाॅलोजीज: इरिगेशन, एग्रीकल्चर ऐण्ड सेटलमेंट पैटर्न डयूरिंग प्रीकलोनियल राजस्थान पुस्तक लिखी है। आपने कई विभिन्न संस्थाओं/संगोष्ठियों में शोध प्रपत्र पढ़ा है एवं अन्य कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में आपके शोध लेख छपे भी है।

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