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‘Jharkhand mein Jaatiya Asmita ka Prashna aur Mazdoor Sangathan', 23rd March, 2015 .

on

‘Jharkhand mein Jaatiya Asmita ka Prashna aur Mazdoor Sangathan'

by

Mr. Sandeep Chatterjee,
Independent Scholar,
New Delhi.

सार :

झारखंडी अस्मिता का प्रश्न और अलग झारखंड राज्य का आंदोलन आधुनिक भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण विषय है। मिशनरी गतिविधियो के फलस्वरूप झारखंड के आदिवासी इलाको में आधुनिक शिक्षा का प्रचार बिरसा मुंडा के समय से ही शुरू हो चुका था। किन्तु शिक्षा के साथ-साथ उपनिवेशवादी शोषण और अन्य इलाकों से आये सेठ साहूकारों के दोहरे शोषण से इन इलाको के आदिवासियों ने समय-समय पर कई आंदोलन किये। बाद के वर्षों में आदिवासी अस्मिता का धुंधला सा स्वरुप बनता है लेकिन तब तक यह राजनीतिक प्रश्न नहीं बना था। हालांकि झारखंड को आदिवासियों के निवास के तौर पर देखने वाले जयपाल सिंह थे जिन्होंने झारखण्ड पार्टी का निर्माण किया था। स्वाधीनता के बाद अलग आदिवासी झारखंड राज्य के लिए संघर्षरत झारखंड पार्टी का विलय कांग्रेस में हो जाता है, जो अपने आप में एक अलग इतिहास है। इस समय तक झारखंड को केवल आदिवासी भूमि के रूप में ही देखा जा रहा था और झारखंडी अस्मिता भी आदिवासी अस्मिता का ही एक नाम था। बाद के वर्षो में खासकर 1970 के दशक में झारखंड आंदोलन का केंद्र दक्षिण झारखंड (सिंहभूम और रांची) से धनबाद कोयलांचल में आ जाता है। इसके बाद न केवल आंदोलन के स्वरुप और बुनियादी प्रश्नों में परिवर्तन दिखता है बल्कि आंदोलन के घटक भी बदलने लगते है। मूल रूप से आदिवासियों के लिए अलग राज्य का आंदोलन में, जिसका परिचालन अब तक अंग्रेजी शिक्षाप्राप्त आदिवासी बुद्धिजीवी वर्ग कर रहा था अब तथाकथित बाहरी गैर-आदिवासी नेताओं का प्रवेश होता है। धनबाद कोयलांचल के मजदूर नेता ए के रॉय और उनका ट्रेड यूनियन बिहार कोलियरी कामगार यूनियन 70 के दशक में अलग झारखंड राज्य के आंदोलन का महत्वपूर्ण अंग बन जाता है और आने वाले दो दशकों तक बना रहता है। गौरतलब है की रॉय न तो आदिवासी थे और ना ही झारखंड के रहने वाले। रॉय के साथ एक अन्य वामपंथी गैर आदिवासी नेता बिनोद बिहारी महतो भी काफी सक्रिय भूमिका अदा करते है, हालाँकि वह झारखंड के स्थानीय कुर्मी जाति से ताल्लुक़ रखते थे।
बाद के वर्षों में रॉय और महतो एक आदिवासी नेता शिबु सोरेन के साथ मिलकर झारखंड के इतिहास का सबसे बड़ा आंदोलन झारखंड मुक्ति मोर्चा की अगुआई में करते है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस वक़्त के आंदोलन में आदिवासी, गैर आदिवासी और प्राय: सभी वर्गों के लोगो ने भाग लिया। कोयलांचल के मजदूर और गावों के खेतिहर साथ मिलकर लाल झंडा और हरा झंडा आंदोलन की अगुआई करने लगे। कुल मिलाकर मजदूर संगठनों ने न केवल आदिवासियों का साथ दिया बल्कि वो खुद बृहत्तर झारखंडी अस्मिता का अभिन्न हिस्सा बन गये। प्रस्तुत व्याख्यान में झारखंडी अस्मिता के विभिन्न पहलुओं के बारे में परख की जाएगी और विशेष करके 1970 के बाद बिहार कोलियरी कामगार यूनियन के योगदान के बारे में चर्चा की जाएगी। आदिवासी अस्मिता के प्रश्न से बृहत्तर अस्मिता की ओर जाना अपने आप में बहुत अनूठा और दिलचस्प है। वो भी तब जबकि इस आंदोलन का मुख्य घटक ऐसा मजदूर वर्ग है जिसका संबंध झारखंड प्रदेश से बहुत पुराना नहीं था। हम ए. के. रॉय के योगदान का भी आंकलन करेंगे जिन्होंने सबसे पहले झारखंडी अस्मिता को आदिवासी अस्मिता के साथ ना जोड़कर एक बड़े दलित अस्मिता के साथ जोड़ा जिनमें शोषित मजदूर वर्ग एक महत्वपूर्ण घटक थे।

परिचय:

श्री संदीप चटर्जी एक स्वतंत्र अध्येता है । आपने दिल्ली यूनिवर्सिटी से इतिहास में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है। आपने 'श्रम, पहचान, झारखण्ड में राजनीति, धनबाद कोलफील्ड क्षेत्र 1946-1989' विषय पर अपना शोध प्रबंध डॉक्टरेट उपाधि के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रस्तुत किया है ।

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