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The Nehru Memorial Museum & Library

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‘Moukhik Parampara mein Pravasan: Parivartan aur nirantarta’, 13 July, 2015.

‘Moukhik Parampara mein Pravasan: Parivartan aur nirantarta’

by

Dr. Dhananjay Singh,
NMML.

सार:

मौखिक परंपरा एवं स्मृतियो ंके भीतर से प्रवसन-संबंधों का अध्ययन जितना दिलचस्प है उतना ही जटिल भी। दिलचस्प इसलिए कि मौखिक परंपरा मे ंविशष्ेा रूप से लोेकगीतो ंमे ंप्रवसन को ऐतिहासिक संदर्भों मे ंअवलाकेन करते ही यह तर्क ख़ारिज हो जाता है कि भोजपुरी भारतीय समाज भूमि से बंधा या जकड़ा हुआ समाज था या अपना घर-बार छोड़कर अंजान दुनिया की ओर कभी जाना नहीं चाहता था या फिर भोजपुरी प्रदेश से प्रवसन की शुरूआत औपनिवेशिक दौर से ही शुरू हुई। लाकेगाथाओ ंएवं लाकेगीतो ंमें प्रयुक्त अधिकांश प्रत्यय स्पष्ट रूप से संकेत करते हैं कि सदियो ंसे भोजपुरी समाज मजबूरी ही नहीं, बल्कि बेहतर अवसरो ंकी तलाश मे ंएक ज़गह से दूसरी ज़गह भटकता रहा है। प्रवसन की यह प्रवृत्ति ;गतिशीलताद्ध पूरे भारतीय समाज पर भी लागू होती है। और जटिल इसलिए कि एक तो मौखिक परंपरा को लाके जीवन का पूरी तरह प्रतिबिंब मानकर चलन ेपर समय, स्थान, सामाजिक परिवर्तन इत्यादि की पकड़, कई स्थलों पर ढीली पड़ जाती है और वह जीवन एवं घटनाओ ं का सीधा प्रस्तुतीकरण ही नहीं बल्कि प्रति-प्रस्तुतीकरण भी है। इस प्रक्रिया मे ंमौखिक परंपरा मे ंअनेक ऐसे तत्व घुस जाते हैं जो उसके सामाजिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन में साधक न होकर बाधक हो जाते हैं। इसलिए लाकेसाहित्य को इतिहास के निकट लाना और इतिहास को लोकसाहित्य के पास ले जाना एक नए बौद्धिक श्रम की मांग करता है। यह अतिरिक्त बौद्धिक श्रम अध्ययन की प्रविधि विशेष को लकेर है। बेशक मौखिक परंपरा की परिभाषा सरल नहीं है, वह भी किसी खास विषय को लेकर। निःसंदेह परंपरा के साथ अनेक जटिल सवाल जुड़ ेहुए हैं।

भारतीय इतिहास मे ंभोजपुरी प्रदेश से आजीविका की खोज मे ंलागेो ंका सुदूर प्रदेशों में प्रवसन प्रक्रिया का साक्ष्य मध्यकाल से ही मिलता है। लेिकन औपनिवेशिक दौर मे ंयह प्रवसन अपने चरम पर पहुँच गया था। आज भी इस क्षेत्र से प्रवसन उसी मात्रा मे ंजारी है-आंतरिक एवं बाहरी, दोनो ंही स्तरो ंपर। तब इनका आंतरिक प्रवसन के केन्द्र यदि कलकत्ता, आसाम, मोरंग थे तो बाहरी प्रवसन के केन्द्र- बर्मा, माॅरीशस, पफीजी, गयुना, त्रिनिदाद, नेपाल, सूरीनाम जैसे उपनिवेश थे। अब दिल्ली, पंजाब, सूरत, अहमदाबाद, मुम्बई जैस ेइलाके भोजपुरिया लोगो ंका पलायन क्षेत्र बने हुए हंै तो पिछल ेकुछेक दशको ंसे खाड़ी देश बाहरी प्रवसन के लिए केन्द्र बने हुए हैं।

भोजपुरी प्रदेश के इस प्रवसन ने संस्कृति के दायरे में आने वाले रस्म रिवाज, संस्कार, विश्वास, गीत-गाथा, नृत्य-नाट्य, कथा-कहानी, देवी-देवता इत्यादि को प्रभावित ही नहीं किया बल्कि बहुत कुछ नये सिरे से उन्हे ंपैदा भी किया है। अर्थात् प्रवसन-संबंधो ंसे अनेक संस्कृतियो ं का जन्म हुआ - जिसमे ंबनिजिया संस्कृति, सिपहिया संस्कृति एवं बिदेसिया संस्कृति प्रमुख हैं। इनकी एक लबंी मौखिक परंपरा रही है और इस परंपरा मे ंउनकी आस्था, विश्वास, हर्ष-उल्लास, सुख-दुख, विचार, रूढि़याँ, तनाव, मान्यताएँ, परंपरा, लाकेविवेक, लोकमूल्य इत्यादि सन्निहित हैं। यदि इन लागेों के अनुभव से निर्मित लाकेसाहित्य को निकाल दें तो भोजपुरी लाकेसाहित्य का आधे से ज्यादा भाग खाली हो जाएगा।

इस सत्र मे ंप्रवसन और मौखिक परंपरा के अंतः.संबंधों के कई पहलअुो ंपर चर्चा होगी। मौखिक परंपरा मे ंप्रवसन की समझ किस रूप मे ंहै, प्रवास-काल को कैसे पकड़ सकते हैं, श्रम रूपो ंकी अभिव्यक्ति किस रूप मे ंहै, कौन-कौन से प्रवास-स्थान रहे हंै या बन रहे हैं, प्रवसन की कौन-कौन सी प्रथाएँ रही हैं, प्रवास हेतु आवागमन के साधनो ंकी सूचना कैसे मिलती है। इसके साथ ही देस-परदेस मे ंसंवाद के लिए संचार माध्यम और प्रवास प्रक्रिया के दौरान भोजपुरी लाकेसमाज के संस्कारो,ं लाकेविश्वासो,ं मान्यताओं, धारणाओं इत्यादि मे ंहुए परिवर्तन और निरंतरता किस रूप मे ंरही है। इन सवालों की खोजबीन के लिए इस परिचर्चा मे ंइतिहास से मौखिक परंपरा और मौखिक परंपरा से इतिहास की ओर आवाज़ाही होगी।

परिचय:

डाॅ. धनंजय सिंह, जूनियर फलेा ेके रूप मे ंनेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय, दिल्ली मे ं ‘प्रवसन चक्र मे ंदेस-परदेस: लाकेसंस्कृति के बदलते आयाम’ विषय पर शाध्ेाकार्य कर रहे हैं। आपने ‘भिखारी ठाकुर के साहित्य’ पर पीएच. डी. की हैं। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला से पोस्ट डाॅक्टरल शोधकार्य के अलावा सराय/सीएसडीएस की स्टूडंेट स्टाईपंेड फलेाेिशप, बी. बी. गिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान से शाध्ेा परियोजना पर कार्य किया है। ‘भोजपुरी प्रवासी श्रमिको ंकी संस्कृति और भिखारी ठाकुर का साहित्य’ नामक पुस्तक लिखन ेके अतिरिक्त आप अनेक पुस्तको ं एवं पत्र-पत्रिकाओ ंमें लख्ेान कार्य करते रहे हैं।

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