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The Nehru Memorial Museum & Library

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‘सिनेमा, शहर और सांस्कृतिक संवाद : नए लोकप्रिय हिंदी सिनेमा में पहचान के सवाल और हिस्सेदारी की टकराहटें : 2000-2016’

रूपरेखा :

यह पर्चा मुख्य रूप से लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा में निर्मित होते शहर आैर उसकी भीतरी ऊबड़-खाबड़ सांस्कृतिक निर्मितियों को पकड़ने की कोशिश है। समकालीन भारतीय शहर एक मेल्टिंग पॉट सरीख़ा है, जहाँ गाँवों से शहर की अोर होते एकतरफ़ा विस्थापन ने आपस में टकराते भिन्न पहचान समूहों को आमने-सामने ला खड़ा किया है। पचास आैर साठ के दशक के सिनेमा के उलट, जहाँ ‘राष्ट्र-राज्य’ के महाआख्यान में तमाम ‘अन्य’ पहचानों को समाहित हो जाना था, यह नया सिनेमा इस शहर रूपी रंगमंच पर हिस्सेदारियों की नवीन लड़ाइयों का गवाह बन रहा है। हाशिए की पहचानों के मुखर होने के इस दौर में नई सदी का हिन्दी सिनेमा स्त्री, दलित, भाषायी आैर इलाकाई हाशिए के समूहों के स्वर आैर साझेदारियों को पहचान रहा है। साथ ही यह उस कड़वे यथार्थ का भी गवाह है, जिसका सामना ‘उम्मीदों भरे महानगर’ में आए हर नागरिक को होता है। ‘खोसला का घोंसला’, ‘शोर इन दि सिटी’, ‘विक्की डोनर’, ‘पीकू’, ‘मसान’, ‘हाइवे’, ‘गुड़गांव’ से लेकर नवीनतम ‘न्यूटन’ तक के उदाहरणों के माध्यम से इस शहर के बदलते यथार्थ को पकड़ने की कोशिश की गई है।
हिन्दुस्तान के समकालीन शहर जहाँ एक अोर विरोधाभासी पहचानों से मिलकर बने शहरी समाज के मध्य निरंतर चलते संघर्षों अौर निरंतर चौड़ी होती अार्थिक अौरसामाजिक खाइयों की तस्वीरें हैं, वहीं एक दूसरे नज़रिए से देखने पर हम इन्हीं शहरों में विभिन्न पहचानों के अापस में मिलने अौर उस द्विपक्षी संवाद से एक नई किस्म कीसाँस्कृतिक पहचान तैयार होने की तस्वीरें भी देख सकते हैं। सिनेमा यहाँ वो टूल है जिसके ज़रिए इस समकालीन बहुवचन शहरी जीवनानुभव को समझने की कोशिश की गई है।

परिचय :

मिहिर पंड्या (जन्म 1985) दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से शहर आैर सिनेमा के अंत:संबंधों पर एम.फ़िल, पीएच.डी उपाधि प्राप्त हैं। उन्होंने अपने अध्यापन की शुरुआत हिन्दू कॉलेज से की आैर उसके बाद वे ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर कार्य कर चुके हैं। उनकी पुस्तक ‘शहर आैर सिनेमा : वाया दिल्ली’ (वाणी प्रकाशन, 2012) हिन्दी सिनेमा में शहर दिल्ली की बदलती संरचना का ‘सत्ता के शहर’ आैर ‘रोज़मर्रा के शहर’ में बांटकर भिन्न नज़रियों से विश्लेषण करती है। इस पुस्तक पर उन्हें 2016 में ‘रुक्मणि वर्मा युवा साहित्यकार सम्मान’ से सम्मानित किया गया है।
बीते सालों में स्वतंत्र लेखक के रूप में वह ‘नवभारत टाइम्स’, ‘दि हिन्दू’, ‘जनसत्ता’, ‘प्रभात खबर’ जैसे अख़बारों में आैर ‘आउटलुक’, ‘तहलका’ जैसी पत्रिकाअों में सिनेमा पर नियमित आलेख आैर कॉलम लिखते रहे हैं। हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाअों ‘तद्भव’, ‘आलोचना’, ‘प्रतिलिपि’, ‘हंस’, ‘नया पथ’, ‘बहुवचन’ में उनके शोध निबंध प्रकाशित हुए हैं। साहित्यिक पत्रिका ‘कथादेश’ में सिनेमा पर उन्होंने चार बरस नियमित कॉलम लिखा। वे भारतीय अन्तरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव, (IFFI) गोवा 2015 से अखबार संपादक के तौर पर जुड़े रहे आैर मुम्बई अन्तरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह, (MAMI) 2017 के कार्यक्रम ‘वर्ड टू स्क्रीन’ के जूरी सदस्य रहे हैं।

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